Wednesday, August 2, 2017

aadil rasheed adil rashid aadil rasheed عادل رشید

 aadil rasheed आदिल रशीद adil rashid


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Wednesday, December 31, 2014

Tuesday, October 1, 2013

निभाये हम ने मरासिम यूँ बदजुबान के साथ .......आदिल रशीद nibhaye ham ne marasim yun badzubaan ke saath.. aadil rasheed


इस पुरानी ग़ज़ल को हिंदी में यहाँ पढ़ें.. आदिल रशीद

निभाए हम ने मरासिम यूँ बदजुबान के साथ
के जैसे रहता है आईना इक चटान के साथ

ज़मीं भी करने लगी अब दुआ किसान के साथ 
के दरया बहने लगा खतरे के निशान के साथ

है तेरे हाथ में अब लाज उसकी रब्बे करीम
परिंदा शर्त लगा बैठा आसमां के साथ

हम ऐसे लोग भला कैसे नींद भर सोयें
के जाग उठती हैं फिकरे मियाँ अज़ान के साथ

कहीं ये बढ़ के मेरा हौसला न क़त्ल करे
तभी तो जंग छिड़ी है मेरी थकान के साथ

वो जिसके सामने दरया ने नाक रगडी है
हमारा रिश्ता है उस आला खानदान के साथ

गरीब होने से तहजीब मर नहीं सकती
वो चीथड़ो में भी रहता है आन बान के साथ
 

wo mujhe janta hi kitna tha ... aadil rasheed वो मुझे जानता ही कितना था ... आदिल रशीद

full ghazal
प्यार का सिलसिला ही कितना था
शब् को मैं जागता ही कितना था

pyaar ka silsila hi kitna tha 
shab ko mai'n jagta hi kitna tha

तुझको अफ़सोस मैं ने कुछ न कहा
और तू भी खुला ही कितना था

tujhko afsos mai'n ne kuch na kaha
aur tu bhi khula hi kitna tha

बेवफाई का क्या करे शिकवा
तू हमारा हुआ ही कितना था

bewafayee ka kya kare'n shikwa
tu hamara hua hi kitna tha

मैं ने ये कह के दिल को समझाया
वो मुझे जानता ही कितना था

mai'n ne ye keh ke dil ko samjhaya
wo mujhe janta hi kitna tha

हँस के देखा पिघल गया ज़ालिम
फिर वो रूठा हुआ ही कितना

hans ke dekha pighal gaya zaalim
phir wo rutha hua hi kitna tha

आज बर्बाद हूँ तो ग़म क्यूँ है
तू मुझे टोंकता ही कितना था

aaj barbaad hu'n to gham kyu'n hai
tu mujhe tokta hi kitna tha

ऐसे वैसों के हाथ आ जाता
दाम मेरा गिरा ही कितना था

aiso'n waiso'n ke hath aa jata
daam mera gira hi kitna tha

बे सबब ही उदास हो आदिल
मिलना जुलना हुआ ही कितना था

besabab hi udas ho aadil
milna julna hua hi kitna tha
 —

Thursday, September 5, 2013

वो लड़की एक कविता एक नज़्म ...wo ladki ek nazm ..aadil rasheed


वो लड़की क्या बताऊँ तुमको कितनी खूबसूरत थी
बस अब ऐसा समझ लीजे परी सी खूबसूरत थी

हवा के जैसी थी चंचल,नदी के जैसी थी निर्मल 
महक उसके बदन की ज्यूँ महकता है कोई संदल

सुनहरी ज़िंदगी के थे हसीं गुलदान आँखों में
बसाये रखती थी साजन के जो अरमान आँखों में

वही जो आईने के सामने सजती संवरती थी
वो शर्मीली सी इक लड़की जो खुद से प्यार करती थी

वही जो आईने के सामने घूंघट उठाती थी
उठा कर अपना ही घूँघट जो खुद से ही लजाती थी

वही जो फूल के जैसे ही हंसती खिलखिलाती थी
ये दुनिया खूबसूरत है वो हर इक को बताती थी

ये दुनिया खूबसूरत है वो अब इनकार करती है
वो लड़की आईने के सामने जाने से डरती है

ये शतरूपा की बेटी है,यही हव्वा की बेटी है
यही ज़ैनब, यही मरयम, यही राधा की बेटी है

जिसे अल्लाह ने पैदा किया है मर्द की ख़ातिर
वो कितने दुःख उठाती है उसी हमदर्द की ख़ातिर

सता कर जो भी मासूमों को खुद को मर्द कहते हैं
जो इन्सां हैं वो ऐसे लोगों को नामर्द कहते हैं

अब इन वहशी दरिंदो को यूँ गर्क़ ए आब कर दीजे
सज़ा तेज़ाब की दुनिया में बस तेज़ाब कर दीजे

आदिल रशीद

ग़र्क़ ए आब = पानी में ग़र्क़ करना, पानी में डुबो देना
आदिल =न्याय करने वाला 
acid victim poem aadil rasheed

इस रचना को बिना मेरी अनुमति कहीं प्रकाशित करना अनुचित है ...आदिल रशीद
+91 9811444626
 — with Babita Solanki and 23 others.


Monday, July 22, 2013

"गुरु पूर्णिमा"........ आदिल रशीद aadil rasheed

खुद से चल कर ये कहाँ तर्ज़े सुखन आया है 
पाँव दाबे हैं बुजुर्गों के तो फन आया है (मुनव्वर राना)

"गुरु पूर्णिमा"  

बहुत से लोगों के लिए ये एक नया नाम होगा।
बहुत से लोगों ने इसे सुना होगा लेकिन इसे समझा नहीं होगा।
और बहुत से लोगों के लिए ये एक अज़ीम दिन है ये दिन है अपने गुरु के नाम का ज़िक्र करने और अपने अकीदत अपनी निष्ठां का इज़हार करने का 
हर इंसान का पहला गुरु उसकी माँ होती सो मेरी भी वही है. हर आदमी का दूसरा गुरु उसका पिता होता है सो मेरे वालिद (पिताजी) मरहूम (स्व.) अब्दुल रशीद मेरे दुसरे गुरु हैं.  उनसे मैं ने जीवन के उतार चढ़ाव के बारे में तो सीखा ही सीखा अरूज़ (फने शायरी) की भी बारीकियां सीखी वो हमेशा कहा करते थे के
 " अरूज़ इतना सीखो के अपना काम चला सको दोस्तों की मदद कर सको लेकिन अरूज़ उतना मत सीखो के अपने दोस्तों को दुश्मन बना लो "

मेरे अन्य गुरु जो रहे जिन्होंने मुझे कलम पकड़ना सिखाया अक्षर ज्ञान दिया क ख ग घ सिखाया मेरे लिए वह सभी अज़ीम थे, हैं, और रहेंगे।

स्कूल से कोलेज तक उन तमाम गुरुओं मे से एक श्री नंदन जी सुना है कालागढ़ से आकर आजकल गाज़ियाबाद में कहीं रहने लगे हैं उनकी तलाश जारी है अगर कोई इस में मेरी मदद कर सके तो मैं आभारी रहूँगा।
शायरी में पिताजी स्व.अब्दुल रशीद जो आलोचक थे के बाद मेरे प्रथम गुरु मरहूम महबूब हसन खां नय्यर तिलहरी रहे जो एतबारुल मुल्क हजरते @दिल शाहजहांपुरी के शागिर्द थे और दिल शाहजहांपुरी महान शायर "अमीर मीनाई" के शागिर्द थे.

मुझे हमेशा ही इस बात पर फख्र रहा के दिल शाहजहांपुरी से होता हुआ मेरा रिश्ता अमीर मीनाई तक जाता है और मुझे अमीर मीनाई का परपोता होने का शरफ हासिल है. 

महबूब हसन खान नय्यर ने ही अपने जीते जी मुझे मेरे तिलहर के ही दूसरे उस्ताद शायर स्व. ताहिर तिलहरी का शागिर्द बनवा दिया था (इस का पूरा विवरण मेरे द्वारा संकलित मेरे गुरु के ग़ज़ल संग्रह " आख़री परवाज़ " में देखा जा सकता है जिसमे मैं ने अपने दोनों गुरुओं के विषय में अपने लेख "ये तुम्हारा ही करम है दूर तक फैला हूँ मैं " में लिखा है ) 
मुझे अपने शायरी के दोनों उस्तादों पहले उस्ताद महबूब हसन खान नय्यर तिलहरी और दुसरे उस्ताद ताहिर तिलहरी पर सदा फख्र रहा है और रहेगा आज के दिन इन सबको मैं अपना सलाम पेश करता हूँ मैं आज जो कुछ भी बन पाया हूँ  ये सब मेरे गुरुओं की और उस्तादों की मेहनतों का और मुहब्बतों का नतीजा है. 

नोट :- सिखाया तो मुझे मेरे दोस्तों और विरोधियों ने भी धोके देकर बहुत कुछ मैं उनका आभारी तो हूँ और ज़िंदगी भर शुक्रगुजार भी रहूँगा लेकिन उन को उस्ताद या गुरु लिखकर "गुरु" जैसे अज़ीम और महान लफ्ज़ की बेइज्ज़ती नहीं कर सकता ……आदिल रशीद 

Friday, July 19, 2013

haayku हायकू आदिल रशीद

कम शब्दों में 
कहे अधिक बात
विधा हायकू  
(आदिल रशीद )
हायकू आदिल रशीद 

Thursday, July 18, 2013

" वो लड़की " एक नज़्म......आदिल रशीद " wo ladki " ... aadil rasheed

वो लड़की क्या बताऊँ तुमको कितनी खूबसूरत थी
बस अब ऐसा समझ लीजे परी सी खूबसूरत थी 

हवा के जैसी थी चंचल,नदी के जैसी थी निर्मल 
महक उसके बदन की ज्यूँ महकता है कोई संदल

सुनहरी ज़िंदगी के थे हसीं गुलदान आँखों में 
बसाये रखती थी साजन के जो अरमान आँखों में


वही जो आईने के सामने सजती संवरती थी​
वो शर्मीली सी इक लड़की जो खुद से प्यार करती थी

वही जो आईने के सामने घूंघट उठाती थी 
उठा कर अपना ही घूँघट जो खुद से ही लजाती थी


वही जो फूल के जैसे ही हंसती खिलखिलाती थी
ये दुनिया खूबसूरत है वो हर इक को बताती थी 

ये दुनिया खूबसूरत है वो अब इनकार करती है 
वो लड़की आईने के सामने जाने से डरती है


ये शतरूपा की बेटी है,यही हव्वा की बेटी है 
यही ज़ैनब, यही मरयम, यही राधा की बेटी है 


जिसे अल्लाह ने पैदा किया है मर्द की ख़ातिर 
वो कितने दुःख उठाती है उसी हमदर्द की ख़ातिर 


सता कर जो भी मासूमों को खुद को मर्द कहते हैं
जो इन्सां हैं वो ऐसे लोगों को नामर्द कहते हैं

अब इन वहशी दरिंदो को यूँ गर्क़ ए आब कर दीजे 
सज़ा तेज़ाब की दुनिया में बस तेज़ाब कर दीजे 

आदिल रशीद 

ग़र्क़ ए आब = पानी में ग़र्क़ करना, पानी में डुबो देना 
आदिल =न्याय करने वाला 

@इस रचना को बिना मेरी इजाज़त अनुमति कहीं प्रकाशित करना अनुचित है ...आदिल रशीद +91 9811444626,9910004373
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